गिरनार का पवन  – भावना मयूर पुरोहित हैदराबाद तेलंगाना

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पवन चले सनन  सनन ,                मेरे गिरनार में । (२)                       
 पवन है बहूरुपिया,
तरह तरह के खेल करें।
पवन शीतल, हिम अंगारे सा_दाहक
कातिल डंक मारे।
गिरनार है; ध्यान मग्न जोगी, ।ओलीया पीर।
पवन चले सनन सनन ,                मेरे गिरनार में (२)
जैसे साधु गिरनार की दाढ़ी,
जैसे झांडीयों लहराये।
पवन (२)
आवाज का जादूगर…
समंदर, रेलगाड़ी, हवाई जहाज,
सभी के आवाजों की यादों दिलाता,
पवन (२)
फिर यकायक…
 जब पवन रूके…
भयानक शांति  डरावनी!!!
झांडीयों  की छलनीयों में  से,
आतीं धूप का;  रास्ता  बदलता,
पवन चले सनन सनन, 
मेरे गिरनार में (२)
हमें हमारी हीं धड़कनें  और             
  सांसों     को सुनाता,
पवन चले सनन सनन,
मेरे गिरनार में (२)
हमें लगता हैं जैसे कि,
माधव हमारे कानों में,                 फूंक मारकर, बांसुरी बजाकर,
हमारा प्राण चलाता है।
गिरनार में, प्रभु अपना अस्तित्व,
जताकर, हमें बताते हैं,
हमारी जीवन नैया है,                 आप के आधीन ।
सांसों लेने के लिए                              हम नहीं हैं, स्वाधीन!!!
हमें जीवन मरण का ,                   राज़ समझाता,
हमारी हस्ती और हमारे अस्थियों,
के बीच का , फांसला कांटता,
हमारी सांसों से हमारी,
जीवन बागडौर संभालता,
पवन चले सनन सनन,
मेरे गिरनार में (२)
भावना मयूर पुरोहित हैदराबाद तेलंगाना

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