“ लिख दे तू अपना नसीब “

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“ लिख दे तू अपना नसीब “

सुख-दु:ख मिले नसीब से,
होना नहीं उदास।
दृढ़ निश्चय से कर्म कर,
मानव जीवन ख़ास ॥
अपने पैरों पर खड़े,
होकर बदल नसीब।
प्रगति ,प्रखरता सब मिले,
देंगे मान क़रीब ॥
क़िस्मत जिनका साथ दे,
वही बने धनवान।
कहे दुनिया ये सर्वदा,
मिले नई पहचान॥
ज़रूर कोई तो लिखता होगा कागज़ और पत्थर का भी नसीब
वरना यह मुमकिन नहीं कि कोई पत्थर ठोकर खाए और
कोई पत्थर भगवान बन जाये!
नसीब निखर जाता है,
तक़दीर भी मुस्काती है।
सारे ग्रह साथ देते,
ख़ुशियों की घड़ी आती है।
सेवा ,स्नेह ,संस्कार भर
विनय भाव पलता है।
सद्भावों की धारा में,
पुष्प भाग्य का खिलता है।
क़िस्मत के तारे चमकते,
सुखों का लगता अंबार।
अनुराग दिलों में पलता,
जीवन में बरसता प्यार।
साथ नसीब उनका देता,
जो तूफां से भीड़ जाते।
क़िस्मत के ताले खुल जाए, कर्मवीर भाग्य बनाते।
जीवन की हर डगर पर,
हौसलों की होती दरकार।
राह की बाधाएं करतीं,
पथिकों का आदर सत्कार।
दशानन का दंभ हरने,
हरि ने लिया राम अवतार।
वन गमन को चले राघव,
नियति लीला अपरंपार।
कृष्ण मित्र सुदामा निर्धन,
खेल नसीबों का सारा।
एक तरफ़ द्वारकाधीश,
दूजा दीन सुदामा प्यारा।
कोई कागज़ रद्दी और
कोई कागज़ गीता ,
और क़ुरान बन जाये।
हाथों की लकीर, किस्मत और नसीब,
जवानी में ऐसी बातें लगती है अजीब।
कर्म करके तू लिख दे अपना नसीब !
दुनिया भी कहे इंसान था वो अजीब! !
—डॉ दक्षा जोशी
अहमदाबाद
गुजरात ।

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