बारिश, भीगा दिन, बहुत सारा काम, खिड़की से, बाहर, झांकने की भी फ़ुर्सत नहीं।

ગુજરાત ધાર્મિક ભારત સમાચાર

बारिश,

भीगा दिन,
बहुत सारा काम,
खिड़की से,
बाहर,
झांकने की भी
फ़ुर्सत नहीं।
कपड़े,
किधर सुखाएं,
इस उधेड़बुन में,
सावन,,भादौ,
सब निकल जाते हैं।
हम में से
बहुतों के तो,
सारे मौसम,
रसोई में ही,
बीत जाते हैं।
करीने से,
सजा हुआ,
ड्रेसिंग टेबल
बिख़र जाता है।
कब,
ठीक से आईना,
आख़री बार ,
देखा था।
याद
किसको रहता है।
कई बार,,
बाल
बस
कस
के
पीछे,,
अनगढ़
जूड़े सा,
बांध लेती हैं,
हम में से कई।
हम में से कईं,
बता ही नहीं,
पाती
कि,
आख़री बार,
कब,
अपने उनका,
हाथ थाम,
कुछ दूर,
संग चलीं थीं।
बारिश की,
फुहारों में,
प्रीत की,
अग्नि में,
जली थीं।
नमक
मिर्च में उलझी,,
सब्ज़ियों के
ताने बाने से,,
रोटियों की गिनती,,
के आगे।
सारे सावन,,
भादौ
सब रीते।
पता ही नहीं,
कब बीते।
क्वार की धूप,
निकली है।
स्वेटर,
रजाई,
सब धूप दिखाने हैं।
हम विटामिन डी की।
गोलियों से काम,
चला लेंगे।
🌺🌺🌺🌺🌺
हम में से कई
बहुत देर से समझती हैं।
अपनी ज़िंदगी।
✍️
TejGujarati