दुनिया, देश और गुजरात के लिए गौरव की बात है कि किसी महिला को संन्यास मिला है । भगवान श्री रजनीश
लोक में
प्रथम नव-संन्यासी मा आनंद मधु भी पहुँचीं.

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भगवान श्री रजनीश
लोक में
प्रथम नव-संन्यासी भी पहुँचीं।

भगवान श्री रजनीश के
नव-संन्यास आंदोलन की
पहली महिला संन्यासिनी मा आनंद मधु का
विक्रम संवत 2078, बैसाख मास, शुक्ल पक्ष, षष्टी, उत्तरायण, सूर्योदय काल 6 बजे
(18 मई 2021)
ओशो रिसोर्ट, देहरादून में शरीर पूरा हुआ।

12.30 दोपहर में अंतिम यात्रा देहरादून से ऋषिकेश के लिए रवाना हुई।

अंतिम संस्कार की सभी प्रक्रिया
स्वामी नीरव कल्याण के द्वारा
गुजराती आश्रम, मायाकुंड, ऋषिकेश की देखरेख में की गईं।

पूर्णानंद घाट पर माँ गंगा किनारे ऋषिकेश हिमालय दोपहर 2 बजे प्रारंभ होकर सुर्यास्त काल में 6.30 पर सम्पन्न हुईं।

लोक डाउन होने के बावजूद भी लगभग 100 मित्रों ने मास्क लगाकर कीर्तन यात्रा में भाग लिया।
ऋषिकेश, देहरादून, दिल्ली, मेरठ, हस्तिनापुर, मुजफ्फरनगर, हरिद्वार, कैथल आदि के मित्रों ने भाग लिया।

26 सितंबर 1970 मनाली हिमालय में नव-संन्यास आंदोलन में मा आनंद मधु का नव-संन्यास
भगवान श्री रजनीश द्वारा हुआ।

नव-संन्यास आंदोलन प्रारंभ होने के बाद पूरे भारत में कीर्तन मंडली
मा आनंद मधु की देखरेख में निकली गईं।

मा आनंद मधु नव संन्यास आंदोलन की अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष भी थीं।

भगवान श्री रजनीश के दर्शन पर आधारित
पहला कम्यून आजोल गुजरात में विश्वनीड़ कम्यून
के नाम से
मा आनंद मधु के संचालन में प्रारंभ हुआ था।

पूना आश्रम के प्रारंभ होने से पहले ही
मा आनंद मधु
भगवान श्री रजनीश के निर्देशन में अज्ञात स्थान पर मौन रहने के लिए चली आई थीं।
उस समय तक
भगवान श्री रजनीश वुडलैंड्स अपार्टमेंट मुंबई में ही रहते थे।

मा आनंद मधु का जन्म गुजरात में हुआ था।
उनकी आयु लगभग 85 वर्ष थी।
वृद्धावस्था के चलते ही शांतिपूर्वक शरीर सामान्य अवस्था में पूरा हुआ।

मा आनंद मधु विख्यात गुजराती स्वतंत्रता सेनानी गांधीवादी परिवार से थीं।
कई संस्थाओं की संस्थापिका और संचालिका भी रहीं।
पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की भतीजी भी थीं।

साथ ही साथ
मा आनंद मधु ने भी
नव-संन्यास को आजीवन जीने के लिए लिया भी।
कभी भी
मा आनंद मधु ने गेरूआ नव-संन्यास नहीं बिसराया।

मा आनंद मधु 50 वर्ष 7 माह 22 दिन
नव-संन्यास आंदोलन को निरंतर जीती और गति देती रहीं।

भगवान श्री रजनीश की विचारधारा में भिन्न-भिन्न रूप से अपने किरदार को निभाती रहीं।

मा आनंद मधु लगभग 14 वर्षों तक ऋषिकेश हिमालय में गंगा माँ के इर्दगिर्द ही मौन भी रहीं।

रजनीशपुरम में 1985 के प्रवचनों के दौरान अपने एक प्रवचन में
भगवान श्री रजनीश ने हिमालय के अज्ञातवास में
मा आनंद मधु के मौन धारण करने को स्मृति में लाया गया।

उसके पश्चात नव-सन्यासियों द्वारा
मा आनंद मधु को खोजा गया।
अन्यथा
मा आनंद मधु को नव-संन्यास जगत द्वारा लगभग विस्मृत कर दिया गया था।

कुछ नव-संन्यासी कहानीकारों ने तो भिन्न भिन्न कहानियां भी
मा आनंद मधु के सम्बंध में सुनाना प्रारंभ कर दिया था।

लगभग 14 वर्षों का मौन करने वाली
भगवान श्री रजनीश की दुनिया में वह एकमात्र संन्यासिन हैं।
अन्य साधना पद्धतियों में भी विरले ही इतने दिनों मौन रहने वाले नज़र नहीं आते।

भगवान श्री रजनीश के
नव-संन्यास आंदोलन में सदियों तक
मा आनंद मधु साधकों के लिए स्वयं के भीतर जाने के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेंगी।

जय भगवान श्री रजनीश
जय मा आनंद मधु
(प्रथम नव-संन्यासी)

ॐ शान्ति
ॐ शान्ति
ॐ शान्ति

एक संक्षिप्त सारगर्भित रिपोर्ट
अनंत की पुकार………….

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